Pareek Parishad, Udaipur

१. नाम
इस संस्था का नाम 'पारीक-परिषद' होगा। इसका मुख्य कार्यालय उदयपुर में होगा और कार्य-क्षेत्र समस्त उदयपुर मण्डल का क्षेत्र होगा।
२. उद्देष्य
  1. पारीक ब्राह्यण समाज को आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक और आर्थिक उन्नति के लिए प्रोत्साहित करना संस्था का ध्येय होगा ।
  2. पारीक-समाज को अपने मूल वैदिक धर्म के प्रति उन्मुख कर तद्नुकूल विद्या-ग्रहण एवं आचरण हेतु पे्ररित करना तथा नित्य नैमित्तिक कर्मो, पंच-महायज्ञो और संस्कारों के लिए पे्ररणा देना ।
  3. समाज में फैली कुरीतियों, कुप्रथाओं, अन्धविष्वासों, भ्रान्तियों और अवैज्ञानिक मान्यताओं के निराकरण हेतु प्रयास करना ।
  4. अन्य शास्त्रोक्त एवं परम्परागत ब्राह्यण वर्गो में आपसी भेद-भाव समाप्त कर एकता का भाव उत्पन्न करना और परस्पर वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना का प्रयत्न करना ।
  5. समाज की आर्थिक उन्नति के लिए षिल्प, कृषि, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्यापारादि अर्थकरी विद्याओं की षिक्षा की व्यवस्था करना ।
  6. जातिय विधवाओं और दीन अनाथोें के आश्रयार्थ यथाषक्ति प्रबन्ध करना ।
  7. उदयपुर मण्डल के विभिन्न नगरों और ग्रामों में परिषद की शाखाए उपषाखाएं स्थापित करना ।
  8. आदर्ष विद्यालयों की स्थापना कर उनमें उच्च षिक्षा का प्रबन्ध करना ।
  9. समय-समय पर पारीक सम्मेलन और आवष्यक होेने पर महासम्मेलन आयोजित करना ।
  10. परिषद की उन्नति में सहायक अन्य आवष्यक विषयों पर भी आवष्यकतानुसार विचार करना ।
३. साधन और कार्य

उपर्युक्त उद्देष्यों की पूर्ति के निर्मित निम्नांकित साधन और कार्य अपनाये जायेंगे |

  1. पारीक-समाज के लिए एक सार्वजनिक भवन की स्थापना ।
  2. पुस्तकालय एवं वाचनालय की स्थापना और व्यवस्था |
  3. छात्रों की आवासीय व्यवस्था, शैक्षणिक कठिनाइयों के निराकरण एवं उनकी प्रतिभा और बौद्धिक चेतना के विकास में यथासम्भव सहयोग करना ।
  4. सिलाई और गृहविज्ञान आदि के षिक्षण की व्यवस्था करना ।
  5. सामाजिक एवं सांस्कृतिक समारोह का आयोजन ।
  6. विभिन्न प्रकार की शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीडा प्रतियोगिताओं का आयोजन ।
  7. नियमित खेल-कूद के साधनों की व्यवस्था ।
  8. औद्योगिक प्रषिक्षण की व्यवस्था समाज के उद्योग-रत्न लोगों का सम्मेलन और समाज के हित में उनके योगदान की व्याख्या करना ।
  9. पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लोक-चेतना का विकास करना ।
  10. परिषद की अपनी एक वार्षिक पत्रिका का प्रकाषन करना ।
४. आय के साधन

पारीक-परिषद के उद्देष्यों की पूर्ति हेतु कोष की व्यवस्था निम्न प्रकार से होगी

  1. सदस्यों से प्राप्त होने वाली प्रवेष तथा वार्षिक सदस्यता राषि ।
  2. समाज के धनी-मानी तथा विषेष सहायता देने वाले सज्जनों से प्राप्त राषि ।
  3. विवाह, पुत्र-पुत्री जन्म और ऐसे ही अन्य मांगलिक अवसरों पर प्राप्त होने वाली राषि ।
  4. अन्य स्रोतो से प्राप्त राषि ।
५. परिषद का गठन और उसके अंग
  1. साधारण सदस्य

    पारीक समाज के प्रत्येक परिवार का कोई एक व्यक्ति जिसकी आयु अठारह वर्ष से कम न हो, परिषद का सदस्य बन सकता है। सदस्यता का इच्छुक व्यक्ति निर्धारित सदस्यता शुल्क और प्रवेष राषि सहित निर्धारित आवेदन पत्र भर कर महामंत्री या अध्यक्ष को प्रस्तुत करेगा। अध्यक्ष की स्वीकृति के उपरान्त ही आवेदक विधिवत सदस्यता ग्रहण कर सकेगा ।

  2. संरक्षक

    जो सज्जन परिषद को १०००० दस हजार ५०,००० पचास हजार​ रूपये या इससे अधिक द्रव्य या सम्पति का दान एक बार में देंगे वे कार्यकारिणी की स्वीकृति से परिषद के आजीवन संरक्षक होंगे।

  3. आजीवन सदस्य

    जो महानुभाव परिषद को ५०००।- (पांच हजार रूपये) या इससे अधिक राषि दान स्वरूप भेंट करेंगे, वे कार्यकारिणी की स्वीकृति से परिषद के आजीवन सदस्य होंगे ।

  4. स्थायी सदस्य

    परिषद के वे सदस्य जो एकमुष्त २१०० रूपये प्रदान करेंगे वे स्थायी सदस्य के रूप में मान्य होंगे और उन्हे प्रति वर्ष वार्षिक शुल्क नही देना होगा ।

  5. प्रतिनिधि सदस्य

    संविधान की धारा २ (VII) के अन्तर्गत उदयपुर मण्डल के अन्य नगरों और ग्रामों में स्थापित परिषद की शाखाओं से चयनित होकर आने वाले अधिकतम दो सदस्य परिषद के प्रतिनिधि सदस्य कहलायंेगे। प्रतिनिधि भेजने वाली संस्था अपनी वार्षिक आय का दषमांष प्रतिवर्ष परिषद के उदयपुर कार्यालय में जमा करायेगी। शाखाओं के प्रतिनिधि चूंकि पारीक महासम्मेलन और परिषद के वार्षिक चुनाव जैसे विषिष्ट अवसरों पर ही आयेंगे अतः उनसे केवल प्रवेष शुल्क ही लिया जायेगा, वार्षिक शुल्क नहीं। प्रतिनिधि सदस्य अपने में से चार सदस्य चयनित करेंगे। जो परिषद की कार्यकारिणी में सम्मिलित किये जायेंगे।

६. सदस्यता से पृथक्करण

परिषद के सदस्य को निम्न परिस्थितियों में सदस्यता से पृथक किया जा सकेगा:

  1. विक्षिप्त हो जाने पर ।
  2. त्यागपत्र देने और उसके स्वीकृत हो जाने पर |
  3. अनुषासन भंग करने पर ।
  4. परिषद के उद्देष्यों की पूर्ति, प्रतिष्ठा और हितों में किसी प्रकार से बाधक सिद्ध होने पर ।
  5. दिवंगत हो जाने पर ।
७. परिषद के पदाधिकारी

परिषद के निम्न पदाधिकारी होंगे

  1. अध्यक्ष - एक
  2. उपाध्यक्ष - एक
  3. महामंत्री - एक
  4. संयुक्त मंत्री - एक
  5. संगठन मंत्री - एक
  6. कोषाध्यक्ष - एक
  7. संचार मंत्री - एक

इन पदाधिकारियों का चुनाव प्रति वर्ष प्रति दो वर्ष में परिषद के साधारण सदस्यों से साधारण सदस्यों के द्वारा किया जायेगा।

८. कार्यकारिणी
  1. साधारण सभा द्वारा निर्वाचित सभी पदाधिकारी कार्यकारिणी के सदस्य होगे और निर्वाचित अध्यक्ष कार्यकारिणी की बैठकों की भी अध्यक्षता करेगा ।
  2. इन पदाधिकारियों के अतिरिक्त परिषद के साधारण सदस्य कार्यकारिणी के लिए भी चार अन्य व्यक्तियों का निर्वाचन करेंगे ।
  3. आवष्यकता होेने पर साधारण सदस्यों में से एक व्यक्ति को कार्यकारिणी में मनोनीत करने का अधिकार अध्यक्ष को होगा ।
  4. समाज के महासम्मेलनादि अवसरों पर आये शाखाओं के प्रतिनिधि भी कार्यसमिति की बैठक में भाग ले सकेंगे ।
  5. कार्यकारिणी के सदस्यों का निर्वाचन यथासंभव सर्वसम्मति से अथवा बहुमत प्रणाली के आधार पर होगा और कार्य-काल एक वर्ष रहेगा ।
  6. कार्यकारिणी के निर्णय का अध्यक्ष के हस्ताक्षर अथवा अध्यक्ष की अनुमति से, महामंत्री के हस्ताक्षर द्वारा क्रियान्वित किया जा सकेगा ।
  7. क्रियान्विति पर साधारण सभा की अगली बैठक में उसकी स्वीकृति प्राप्त करना आवष्यक होगा ।
  8. कार्यकारिणी की बैठक किसी भी समय बुलाई जा सकेगी किन्तु तीन माह में कम से कम एक बैठक अवष्य होगी। महामंत्री अध्यक्ष की अनुमति से कार्यसमिति की बैठक बुलायेगे ।
  9. बैठक के लिए कम से कम छः सदस्यों की उपस्थिति आवष्यक होगी। कोरम पूरा न होने की स्थिति में बैठक स्थगित की जायेगी पर स्थगित बैठक के पुनः आहूत होने पर कोरम का पूरा होना आवष्यक नही होगा ।
९. कोष-व्यवस्था
  1. परिषद की धन-राषि किसी बैंक या पोस्ट आॅफिस में रहेगी य हां, आकस्मिक और फुटकर व्यय हेतु अधिकतम सौ रूपये की राषि कोषाध्यक्ष के पास रह सकेगी ।
  2. अध्यक्ष, महामंत्री और कोषाध्यक्ष में से किन्हीं दो के हस्ताक्षरों से राषि बैंक या पोस्ट-आॅफिस से निकाली जा सकेगी ।
  3. आय-व्यय के लेखा पर प्रति माह अध्यक्ष के हस्ताक्षर कराने होंगे।
१०. परिषद के पदाधिकारियों के कर्तव्य और अधिकार
  1. अध्यक्ष
    1. परिषद की साधारण सभा, कार्यकारिणी तथा परिषद द्वारा आयोजित अन्य समारोंहो की अध्यक्षता करना ।
    2. परिषद की साधारण सभा की बैठकों में लिये गये निर्णयों को पदाधिकारियों से परामर्ष कर, व्यावहारिक रूप देना ।
    3. परिषद की आर्थिक स्थिति को सुधारने की दिषा में प्रयत्नषील होना ।
    4. साधारण सभा की गत बैठक की कार्यवाही का महामंत्री द्वारा तैयार किये गये विवरण पत्र की सभा द्वारा पुष्टि हो जाने पर वितरण पत्र पर हस्ताक्षर करना ।
    5. अत्यावष्यक होने पर कार्यकारिणी की बैठक स्वयं आमंत्रित करना ।
    6. बजट का ध्यान रखते हुए व्यय को संतुलित रखना और बजट विरूद्ध व्यय पर अंकुष रखना। विषेष अवस्था में व्यय के एक मद की राषि को दूसरे मद में व्यय की स्वीकृति देना और इसकी कार्यकारिणी की अगली बैठक में स्वीकृति लेना ।
    7. कार्यकारिणी की कार्य सूची (एजेण्डा) में विचारार्थ प्रस्तुत किसी विषेष विषय पर विचार की स्वीकृति देना ।
  2. उपाध्यक्ष
    1. अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष के उपर्युक्त अधिकारों और कर्तत्यों का उपभोग और निर्वहन करना ।
  3. महामंत्री
    1. परिषद की बैठकों का सुचारू संचालन करना ।
    2. साधारण सभा और कार्यकारिणी की समय-समय पर बैठकें बुलाना और उनमें लिये गये निर्णयों का विवरण नोट करना ।
    3. परिषद के उद्देष्यों के प्रचारार्थ धन-संग्रह हेतु व्यापक सम्पर्क करना ।
    4. कार्यकारिणी और साधारण सभा के लिए कार्य सूची (एजेण्डा) तैयार करना ।
    5. परिषद की ओर से न्यायालय सम्बन्धी सभी कार्यो का सम्पादन कराना और उन्हे संचालित करना ।
    6. अध्यक्ष की अनुमति से पे्रस नोट जारी करना ।
    7. परिषद की चल-अचल सम्पति की देख रेख और व्यवस्था के विषय में उचित निर्णय लेना ।
    8. परिषद का वार्षिक प्रतिवेदन और विवरण तैयार करना। ऐसा ही विवरण महासम्मलेन के पूर्व तैयार कर कार्यकारिणी की स्वीकृति से उसे प्रकाषित करवाना ।
    9. धन-संग्रह के लिए किये गये पत्र व्यवहार तथा अन्य अभिलेखों का संरक्षण करना ।
  4. संयुक्त मंत्री
    1. महामंत्री के सभी कार्यो में सहयोग करना ।
    2. महामंत्री की अनुपस्थिति में उनके अधिकारों और कर्तव्यों का उपभोग एवं निर्वहन करना ।
  5. संगठन मंत्री
    1. परिषद के संगठनात्मक कार्य को संभालना ।
    2. महामंत्री के कार्यो में हाथ बंटाना ।
    3. नगर में नवागत पारीक बन्धुओं से सम्पर्क साध कर उन्हे परिषद का सदस्य बनाना ।
    4. परिषद के उद्देष्यों का प्रचार प्रसार करना।
  6. कोषाध्यक्ष
    1. परिषद के आय-व्यय का पूरा ब्योरा रखना तथा धन की वृद्धि के उपाय करना ।
    2. कैष-बुक और खाते को लिखना तथा रोकड का प्रतिमास बाकी निकाल कर महामंत्री से उसकी जांच कराना ।
    3. बैंक की चैक-बुक और पास-बुक सुरक्षित रखना ।
    4. बजट के अनुसार अध्यक्ष या महामंत्री द्वारा रूपया देने की स्वीकृति के अनुसार भुगतान कर उचित रसीद लेना और वाउचरों को सुरक्षित रखना ।
    5. अध्यक्ष या महामंत्री के कहने पर लेखा निरीक्षक को पंजिकाएं (रजिस्टर आदि) वाउचर, केष-बुक, चैक-बुक आदि प्रस्तुत करना ।
    6. चलित लेखा में अपने पास सौ रूपये तक की राषि रखना ।
    7. वार्षिक अधिवेषन से पूर्व वर्ष भर के आय-व्यय का नियुक्त निरीक्षक से जांच करवाने के बाद अपना प्रतिवेदन परिषद से सम्मुख रखना ।
    8. जो रूपया जिस प्रभाग के लिए प्राप्त हो उसी में जमा कराना और एक मद से दूसरे मद में अध्यक्ष / महामंत्री की अनुमति से ही स्थानान्तरित करना।
  7. संचार मंत्री
    1. पारीक परिषद की वेब साइट तैयार करना एवं समय-समय पर सूचनाओं को अपग्रेड करना
    2. पारीक परिषद की गतिविधियों को सभी अन्य संगठनो की जानकारी में लाना।
११. संविधान-संषोधन

संविधान में परिषद के तीन-चैथाई (उपस्थितों में से) संख्या के बहुमत से संषोधन किया जा सकेगा।

संषोधन - 1 (दिनांक ०७.०१.२००१)
  1. परिषद के विधान के क्रमांक-७ में कार्यकारिणी के चुनाव प्रतिवर्ष होने का अंकित है जिसे दिनांक ०७.०१.२००१ की बैठक में सर्वसम्मति से दो वर्ष में कराना तय किया गया
  2. दो नये सदस्य ओर स्थापित किये गये ।
संषोधन - 2 (दिनांक ११.०९.२०११)
  1. परिषद के विधान के क्रमांक-५ (II) में दिनांक ११.०९.२०११ की वार्षिक बैठक में सर्वसम्मति से संरक्षक के लिये रूपये १०,००० के बजाय ५०,००० किया गया ।
  2. बैठक में संचार मंत्री का नया पद व दो नये सदस्य ओर स्थापित किये गये। संचार मंत्री का मुख्य कार्य पारीक परिषद की वेब साइट तैयार करना, समय-समय पर सूचनाओं को अपग्रेड करना व पारीक परिषद की गतिविधियों को सभी अन्य संगठनो की जानकारी में लाना।